श्रीकृष्ण, जो कि विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं, केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक पात्र नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के हर क्षेत्र में एक आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनका जीवन कर्म, धर्म, भक्ति, प्रेम और करुणा का एक अनुपम संगम है। श्रीकृष्ण की लीलाएँ चाहे बाल्यकाल की हों, गीता का उपदेश हो या फिर उनकी गृहस्थ जीवन की कहानियाँ – हर एक प्रसंग हमें जीवन के गूढ़ सत्य सिखाता है।
श्रीकृष्ण के विवाहों की कथा भी बहुत गूढ़ और अर्थपूर्ण है। यह केवल सांसारिक विवाह नहीं, बल्कि ये हर उस आत्मा के साथ उनका एक आध्यात्मिक संबंध है, जो प्रेमपूर्वक उनके शरणागत होती है। उनके जीवन में कुल 16,108 पत्नियाँ थीं, जिनमें से 8 को अष्टा-भार्या कहा जाता है, और शेष 16,100 नारकासुर से उद्धार की गई राजकुमारियाँ थीं।
श्रीकृष्ण की 8 प्रमुख पत्नियाँ थीं, जिन्हें अष्टा भार्या कहा जाता है। ये रानियाँ उनके साथ द्वारका में निवास करती थीं और उनका जीवन भक्ति, सेवा और प्रेम से परिपूर्ण था। इनके नाम हैं:
आठ प्रमुख रानियाँ (अष्टा-भार्या)
श्रीकृष्ण जी की आठ मुख्य पत्नियाँ थीं, जिन्हें अष्टा-भार्या कहा जाता है। ये रानियाँ थीं:
1. रुक्मिणी देवी – प्रथम और प्रियतम पत्नी
- विदर्भ की राजकुमारी और देवी लक्ष्मी का अवतार मानी जाती हैं।
- रुक्मिणी जी ने स्वयं श्रीकृष्ण को पत्र लिखकर अपने मन की बात कही, और श्रीकृष्ण ने उनका स्वयंवर से हरण कर विवाह किया।
- वह आदर्श पत्नी, भक्ति की मूर्ति, और श्रीकृष्ण के हृदय की रानी थीं।
2. जाम्बवती – सत्य की प्रतीक
- रीछराज जाम्बवान की पुत्री।
- स्यमंतक मणि के विवाद के समय जाम्बवान से युद्ध हुआ। अंत में उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया।
- यह विवाह ज्ञान और आत्म-समर्पण का प्रतीक है।
3. सत्यभामा – साहस, सौंदर्य और स्वाभिमान की देवी
- यादव कुल की राजकुमारी।
- श्रीकृष्ण ने नारकासुर वध में इनका साथ लिया।
- सत्यभामा की कथा हमें बताती है कि अहंकार को भी भक्ति में बदल कर ईश्वर के चरणों में रखा जा सकता है।
4. कालिंदी – तपस्या की प्रतीक
- सूर्यदेव की पुत्री थीं।
- श्रीकृष्ण से विवाह की इच्छा लेकर यमुना तट पर तप कर रही थीं।
- भगवान ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उनसे विवाह किया।
5. मित्रविंदा – परिवार विरोध के बावजूद समर्पण की मिसाल
- अवंती राज्य की राजकुमारी।
- स्वयंवर में श्रीकृष्ण को वरण किया, लेकिन भाइयों ने विरोध किया।
- श्रीकृष्ण ने उनका सम्मान रखते हुए उन्हें अपनाया।
6. नग्नजिती (सत्या) – पराक्रम की परख
- कौशल्य देश की राजकुमारी।
- सात उग्र बैलों को वश में करने की शर्त थी।
- श्रीकृष्ण ने पराक्रम से कार्य सिद्ध किया और विवाह किया।
7. भद्रा – शांत स्वभाव की आदर्श रानी
- कई ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि उनका विवाह भाईयों ने स्वयं श्रीकृष्ण से कराया।
- वे शांति, सेवा और भक्ति की मूर्ति थीं।
8. लक्ष्मणा (या मद्री) – सौंदर्य और सौम्यता का संगम
- मद्र देश की राजकुमारी।
- श्रीकृष्ण ने स्वयंवर में विजयी होकर उनसे विवाह किया।
ये सभी रानियाँ द्वारका में श्रीकृष्ण के साथ रहीं और भक्ति में लीन थीं।
16,100 राजकुमारियों का उद्धार
इन आठ रानियों के अतिरिक्त, श्रीकृष्ण जी ने 16,100 अन्य राजकुमारियों से भी विवाह किया। ये सभी नारकासुर नामक राक्षस के बंदीगृह में कैद थीं।
भगवान श्रीकृष्ण ने उनका उद्धार किया और समाज में उनका सम्मान बनाए रखने के लिए उनसे विवाह किया। यह विवाह उनके करुणा और धर्म के पालन का प्रतीक है।
द्वारका में उनका जीवन और आध्यात्मिक संकेत
श्रीमद्भागवत, हरिवंश पुराण, और विष्णु पुराण में वर्णित है कि:
भगवान श्रीकृष्ण योगमाया के प्रभाव से एक ही समय में सभी रानियों के साथ अलग-अलग महलों में उपस्थित रहते थे।
हर रानी को ऐसा प्रतीत होता था कि भगवान केवल उनके साथ हैं। यह ईश्वर की सर्वव्यापकता और हर भक्त के प्रति विशेष स्नेह का प्रतीक है।
इन रानियों से भगवान को प्रत्येक रूप में संतानें भी प्राप्त हुईं – जिससे वह गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए भी धर्म, न्याय और समाज निर्माण में संलग्न रहे।
आध्यात्मिक संदेश
श्रीकृष्ण के इतने विवाह मात्र सांसारिक घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक संकेत हैं। वे यह दर्शाते हैं कि भगवान प्रत्येक आत्मा को अपनाते हैं जो प्रेमपूर्वक उनके शरण में आती है। हर भक्त, चाहे वह किसी भी परिस्थिति में हो, भगवान की कृपा का अधिकारी बन सकता है।
निष्कर्ष:
श्रीकृष्ण जी की कुल 16,108 पत्नियाँ थीं — जिनमें 8 मुख्य रानियाँ थीं और 16,100 वो स्त्रियाँ थीं जिन्हें उन्होंने उद्धार करके अपनाया था। यह कथा भगवान के प्रेम, भक्ति और करुणा का सुंदर उदाहरण है।
FAQ’s
शास्त्रों (विशेष रूप से भागवत पुराण, विष्णु पुराण, और हरिवंश पुराण) के अनुसार, श्रीकृष्ण जी की कुल 16,108 पत्नियाँ थीं — जिनमें 8 प्रमुख रानियाँ (अष्टा-भार्या) थीं और 16,100 नारियाँ वे थीं जिन्हें उन्होंने नारकासुर से मुक्त कर सम्मानपूर्वक अपनाया।
ऐतिहासिक रूप से इसे प्रतीकात्मक भी माना जाता है, जो यह दर्शाता है कि भगवान हर आत्मा को अपनाते हैं, चाहे वह किसी भी परिस्थिति में क्यों न हो।
नारकासुर ने इन कन्याओं को बंदी बना लिया था, जिससे समाज ने उन्हें अस्वीकार कर दिया था।
श्रीकृष्ण ने उन्हें सम्मानपूर्वक अपनाकर विवाह किया, ताकि उनका सामाजिक मान-सम्मान बना रहे। यह विवाह केवल सांसारिक नहीं था, बल्कि करुणा, सामाजिक जिम्मेदारी और धर्म का प्रतीक था।
इन 8 रानियों को अष्टा-भार्या कहा जाता है। वे थीं:
रुक्मिणी, जाम्बवती, सत्यभामा, कालिंदी, मित्रविंदा, नग्नजिति (सत्या), भद्रा, mलक्ष्मणा (मद्री)
इन सभी का श्रीकृष्ण से विवाह विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ और वे भक्ति, ज्ञान, साहस, तपस्या, सेवा और प्रेम जैसी विभिन्न भावनाओं की प्रतीक मानी जाती हैं।
शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने योगमाया के प्रभाव से प्रत्येक रानी के साथ अलग-अलग महलों में एक साथ निवास किया।
प्रत्येक रानी को यह अनुभूति होती थी कि भगवान केवल उनके साथ हैं। यह दर्शाता है कि ईश्वर प्रत्येक भक्त को विशेष महत्व देते हैं।
श्रीकृष्ण के विवाह केवल प्रेम या ऐश्वर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि वे धर्म, करुणा, भक्ति, समाज सेवा और आत्मा के उद्धार का गहरा संदेश देते हैं।
यह सिखाते हैं कि ईश्वर किसी को नहीं छोड़ते, और जो भी प्रेमपूर्वक उनकी शरण में आता है, वे उसे अपनाते हैं — चाहे वह समाज में कितना भी उपेक्षित क्यों न हो।
🙏 राधा वल्लभ श्री हरिवंश 🙏